निरोग और योग का आंतरिक संबंध
Rajesh Tripathi
Assistant Professor Yoga Science, Govind Guru Tribal University Banswara, Rajasthan, India.
*Corresponding Author E-mail: rajeshtripathi887@gmail.com
ABSTRACT:
योग और ध्यान को, भारत की ही तरह, यूरोप में भी मूल रूप से एक धार्मिक-आध्यात्मिक विषय ही माना जाता था। उनकी उपयोगिता को लेकर गंभीर क़िस्म के वैज्ञानिक शोध नहीं होते थे। किंतु अब वैज्ञानिक जितना ही अधिक शोध कर रहे हैं, उतना ही अधिक मुग्ध हो रहे हैं। लंबे समय तक यूरोप वालों के लिए भी योग का अर्थ शरीर को खींचने-तानने और ऐंठने-मरोड़ने की एक कठिन भारतीय ’हिंदू’ कला से अधिक नहीं था। ’हिंदू’ शब्द उसकी व्यापक स्वीकृति और वैज्ञानिक अनुमति में मनोवैज्ञानिक बाधा डालने के लिए कभी-कभार अब भी उसके साथ जोड़ा जाता है।
KEYWORDS: योग और स्वास्थ्य, शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शांति, प्राणायाम के लाभ, ध्यान और मानसिक स्वास्थ्य, आध्यात्मिक स्वास्थ्य, आसन और निरोगी जीवन, तनाव मुक्ति योग, रोग प्रतिरोधक क्षमता और योग, स्वस्थ जीवनशैली, योग के लाभ, प्राकृतिक उपचार।
प्रस्तावना
विज्ञान के लिए वह सब प्रायः अवैज्ञानिक और अछूत रहा है, जिसका आत्मा-परमात्मा जैसी अलौकिक, अभौतिक अवधारणाओं से कुछ भी संबंध हो। जो कुछ अभौतिक है, नापा-तौला नहीं जा सकता, विज्ञान की दृष्टि से उसका अस्तित्व भी नहीं हो सकता। हालांकि महान भौतिकशास्त्री अलबर्ट आइनश्टाइन भी मानते थे कि भौतिकता से परे भी कोई वास्तविकता है। जर्मनी की डॉ. डागमार वूयास्तिक को भौतिकता से परे ऐसी ही एक वास्तविकता का पता लगाने का काम सौंपा गया हैं। वूयास्तिक ने भारतविद्या (इंडोलॉजी) में डॉक्टरेट की है। भारत की पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों का अध्ययन उनका प्रिय विषय रहा है। यूरोपीय संघ की वैज्ञानिक शोध परिषद से मिले 14 लाख यूरो (इस समय 1 यूरो = 74 रुपए) के एक आरंभिक अनुदान के आधार पर तीन सदस्यों की उनकी टीम, 2015 के वसंतकाल से, ऑस्ट्रिया के वियेना विश्वविद्यालय में ’’औषधि, अमरत्व और मोक्ष’’ नाम की एक परियोजना पर काम कर रही है। सोचने की बात है कि भारत में अमरत्व और मोक्ष जैसी बातों की खिल्ली उड़ाई जाती है, जबकि यूरोपीय संघ उनकी वैज्ञानिक विवेचना जानना चाहता है।
निरोग शब्द का अर्थ है स्वस्थ, रोगमुक्त। जबकि योग एक प्राचीन भारतीय अभ्यास है जो शरीर, मन और आत्मा को एकजुट करने पर केंद्रित है। दोनों शब्दों के बीच एक गहरा और जटिल संबंध है।
योग और स्वास्थ्य का संबंध:- योग सिर्फ शारीरिक व्यायाम नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक अभ्यास है जिसमें आसन, प्राणायाम, ध्यान और अन्य तकनीकें शामिल हैं। ये सभी तकनीकें शरीर को स्वस्थ रखने और बीमारियों से लड़ने में मदद करती हैं।
शारीरिक स्वास्थ्य:- योग आसन शरीर को लचीला बनाते हैं, मांसपेशियों को मजबूत करते हैं और रक्त संचार को बेहतर बनाते हैं। यह पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने और प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने में भी मदद करता है।
मानसिक स्वास्थ्य:- योग ध्यान तनाव, चिंता और अवसाद को कम करने में मदद करता है। यह मन को शांत करता है और एकाग्रता बढ़ाता है।
आध्यात्मिक स्वास्थ्य:- योग आत्मज्ञान और आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है। यह व्यक्ति को अपने भीतर की शक्ति को खोजने और जीवन के उद्देश्य को समझने में मदद करता है।
योग के निरोग होने में योगदान
तनाव कम करना:- योग की विभिन्न तकनीकें तनाव को कम करने में प्रभावी होती हैं। तनाव कई बीमारियों का मूल कारण होता है।
रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना:- योग नियमित रूप से करने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, जिससे शरीर संक्रमण से बेहतर ढंग से लड़ सकता है।
पाचन तंत्र को स्वस्थ रखना:- योग आसन पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं, जिससे कब्ज, एसिडिटी जैसी समस्याएं दूर होती हैं।
हृदय स्वास्थ्य:- योग हृदय स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद करता है। यह रक्तचाप को नियंत्रित करता है और हृदय गति को कम करता है।
नींद की गुणवत्ता में सुधार:- योग नींद की गुणवत्ता में सुधार करता है, जिससे व्यक्ति अधिक ऊर्जावान और ताज़ा महसूस करता है।
अमरत्व और मोक्ष की खोज
डॉ. वूयास्तिक का कहना है कि उनकी टीम संस्कृत में लिखी पुरानी पांडुलिपियों और हिंदी-अंग्रेज़ी में उपलब्ध पुस्तकों की सहायता से ’’औषधि, अमरत्व और मोक्ष’’ के ऐतिहासिक एवं दार्शनिक पक्ष का अध्ययन कर रही है। इसके लिए तीन कार्यक्षेत्र चुने गए हैं दृ दो हज़ार वर्ष तक पुरानी आयुर्वेदिक पांडुलिपियां, ऐसे रासायनिक पदार्थों संबंधी साहित्य, जिनमें अमृत जैसे जादुई प्रभाव वाली दवाओं का वर्णन मिलता है, और हठयोग संबंधी 15वीं सदी तक की पांडुलिपियां व साहित्य।
सबसे अधिक ध्यान हठयोग के बारे में उन पांडुलिपियों और पुस्तकों पर दिया जाएगा, जिनमें आसनों और प्राणायाम द्वारा हर प्रकार की बीमारियों से लड़ने-बचने की विधियों का वर्णन किया गया है। डॉ. वूयास्तिक का मानना है कि आसन, प्राणायाम और ध्यान पर आधारित तीन अंगों वाले हठयोग से ही प्राचीन भारत के ऋषि-मुनि निरोग रहते और दीर्घायु होते थे। पिछले 20-25 वर्षों से यूरोप में योग की, विशेषकर हठयोग, की जब से धूम मची है, चिकित्सा, स्वास्थ्य और मनोविज्ञान में उस पर शोधकार्यों की भी बाढ़ आ गई है। उसकी उपयोगिता और कारगरता के बारे में नित नए सामाचार आने लगे हैं। नियमित रूप से हठयोग लगभग सभी बीमारियों को दूर रखने की रामबाण दवा सिद्ध हो रहा है। उसकी सहायता से पीठ और कमर-दर्द को दूर करने से लेकर हृदयरोगों और कैंसर तक की रोकथाम या उनकी डॉक्टरी चिकित्सा के बाद स्वास्थ्यलाभ और पुनर्वासन (रिहैबिलिटेशन) की गति को तेज़ किया जा सकता है।
विभिन्न देशों में हुए इन अध्ययनों का निचोड़ यह है कि योगाभ्यास और ध्यान करने से रक्तवसा (कोलोस्ट्रॉल) की मात्रा और मोटापे को घटाया जा सकता है। हृदयशूल (ऐंजाइना पेक्टरिस) और रक्तवाहिकाएं तंग हो जाने पर सही क़िस्म के नियमित योगासनों से लाभ मिलता है। हठयोग बीमारियों की रोकथाम तो करता ही है, पर यदि कोई व्यक्ति योग नहीं भी करता रहा हो और बीमार पड़ जाए, तो उसकी उपचार-योजना में हठयोग को शामिल करने पर रक्त के विभिन्न घटकों की मात्राओं में अनुकूल सुधार लाया जा सकता है। विभिन्न हार्मोनों के स्राव सामान्य स्तर पर आने लगते हैं। जोड़ों में मानो चिकनाहट बढ़ जाती है। बैक्टीरिया और वायरस से लड़ने की शरीर की रोग-प्रतिरक्षण प्रणाली और भी शक्तिशाली बनती है।
नियमित रूप से हठयोग करने पर रक्त में ’इंटरल्यूकीन-6’ (आईएल-6) नाम के प्रोटीन का संकेंद्रण घटता है। यह एक ऐसा प्रोटीन है, जिस की मात्रा रक्त में बढ़ने से हृदयरोग, मस्तिष्काघात (लकवा), मधुमेह 2 (डायबेटीज़2) या जोड़ों में दर्द जैसी बीमारियां होती हैं। शरीर के भीतरी अंगों में जलन या सूजन पैदा करने में भी इस प्रोटीन की भूमिका होती है। नियमित योगाभ्यास है सबसे कारगर दवा: योगाभ्यास उन बीमारियों के विरुद्ध सबसे कारगर और उपप्रभाव (साइड इफ़ेक्ट) रहित सुरक्षित दवा के समान है, जो हमारी आधुनिक रहन-सहन की देन हैं - जैसे हाथ-पैर और कमर में दर्द, मधुमेह जैसी चयापचय (मेटबॉलिज़्म) में गड़बड़ी की बीमारियां, सांस, हृदय और रक्तंचार की बीमारियां, यहां तक कि मानसिक बीमारियां भी। महिलाओं के बीच योगाभ्यास की सबसे अधिक लोकप्रियता का एक प्रमुख कारण यह है कि मासिकधर्म के कष्टों, गर्भधारण होने या नहीं होने की समस्याओं या रजोविराम जैसी अवस्थाओं की शारीरिक ही नहीं, मानसिक परेशानियां कम करने में योगाभ्यास से सहायता मिलती है। जर्मनी में लापज़िग के डॉक्टर डीट्रिश एबर्ट 1980 वाले दशक से ही एक उपचारविधि के तौर पर हठयोग की उपयोगिता का अध्ययन करते रहे हैं।
रोगप्रतिरक्षण प्रणाली बने और भी प्रभावशाली
नॉर्वे के वैज्ञानिकों ने हाल ही में पाया कि हठयोग बहुत थोड़े ही समय में शरीर की रोगप्रतिरक्षण प्रणाली (इम्यून सिस्टम) पर अनुकूल प्रभाव डालने लगता है। नियमित हठयोग न केवल तनाव घटाता है, हड्डियों को भी मज़बूत करता है, अवसाद (डिप्रेशन) और कमर या पीठ के दर्द को कम करता है और गंभीर क़िस्म के हृदयरोगों का ख़तरा भी टालता है। नॉर्वे की विज्ञान पत्रिका ’प्लोस वन’ में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, वहां के वैज्ञानिकों नेइन प्रभावों को रोगप्रतिरक्षण प्रणाली की तथाकथित ’टी’ (ज्) कोशिकाओं के जीनों में आए परिवर्तनों के द्वारा प्रमाणित किया है। इस अध्ययन के लिए नॉर्वे में दस लोगों को एक सप्ताह तक हठयोग के तीनों अंगों यानी आसनों, प्राणायाम और ध्यानधारण का अभ्यास कराया गया। चार-चार घंटे चलने वाले अभ्यास-सत्रों से पहले और बाद में प्रतिभागियों के रक्त-नमूने लिए गए और प्रयोगशाला में उनकी तुरंत जांच की गई। दस दिन बाद पाया गया कि रोगप्रतिरक्षण प्रणाली की ’टी’ कोशिकाओं के 111 जीन पहले की अपेक्षा बदले हुए थे। तुलना के लिए, जो लोग दौड़ लगाते या कोई पश्चिमी नृत्य करते हैं, उनके प्रसंग में मुश्किल से 38 जीन ही बदले हुए मिलते हैं। जीन तक में नवजीवन का संचार: इस अध्ययन की रिपोर्ट में कहा गया है कि ’’हठयोग करने के दो घंटों के भीतर ही ’टी’ कोशिकाओं के जीनों में परिवर्तन होने लगा था... इसका अर्थ यही है कि योगाभ्यास जैव-आणविक स्तर पर तुरंत और दीर्धकालिक प्रभाव डालने लगता है।’’ इस परिणाम का एक दूसरा अर्थ यह भी निकलता है कि आजकल योग के कुछेक हल्के-फुल्के आसन कर लेने का जो फ़ैशन चल पड़ा है, उससे योगाभ्यास का पूरा लाभ नहीं मिल सकता। आसनों के बाद प्राणायाम और ध्यानधारण नहीं करने पर सारा लाभ अधूरा और अस्थायी ही सिद्ध होगा। भारतीय ऋषियों-मुनियों ने प्राणायाम और ध्यानधारण को व्यर्थ ही हठयोग का अंग नहीं बनाया था।
हठयोग संबंधी अन्य प्रयोगों एवं अध्ययनों से भी यही सिद्ध होता है कि वह जैव-आणविक स्तर पर काम करता है। जैव-आणविक स्तर और प्रमात्रा-भौतिकी (क्वांटम फ़िजिक्स) के बीच सीमारेखा खींचना बहुत कठिन काम है। प्रमात्रा भौतिकी की दुनिया इतनी गूढ़ और रहस्यमय है कि उसे पदार्थ का आध्यात्मिक स्तर कहा जा सकता है। इस स्तर पर पदार्थ और ऊर्जा के बीच अंतर नहीं रह जाता। उदाहरण के लिए, प्रकाशकण फ़ोटोन पदार्थ भी है और ऊर्जा भी। संभवतः इसी कारण ध्यानमग्नता या समाधि की अवस्था में व्यक्ति को कई बार रंगीन या सफ़ेद प्रकाश दिखाई पड़ता है, जो उसकी अपनी जैव-ऊर्जा का ही एक रूप होना चाहिए। योगियों का कहना है कि कुंडलिनी जागृत होने पर भी ऐसा ही प्रकाश मूलाधार चक्र से निकलकर ऊपर की ओर जाता है। वैज्ञानिक अपने अध्ययनों में फ़िलहाल जैव-आणविक स्तर से आगे नहीं गए हैं। वे यह भी नहीं मानते कि हमारे शरीर में कुंडलिनी या मूलाधार चक्र नाम की की कोई संरचना है। 20-25 साल पहले यही वैज्ञानिक यह भी नहीं मानते थे कि योगाभ्यास करने से आदमी निरोग बन सकता है या किसी गंभीर बीमारी के बाद तेज़ी से स्वास्थ्य लाभ कर सकता है।
बुद्धि भी बलवती होती है
बर्लिन के ’शारिते’ अस्पताल, जर्मनी के गीसन विश्वविद्यलय और कई अमेरिकी विश्वविद्यलयों की एक मिलीजुली टीम ने 2014 में पाया कि शिक्षा और स्वास्थ्य का एक ही जैसा स्तर होने पर भी ध्यान साधना करने वालों और अनुभवी योगाभ्यासियों की बौद्धिक क्षमता उन लोगों की तुलना में कहीं अधिक समय तक बनी रहती है, जो योग-ध्यान नहीं करते। इस अध्ययन के लिए 16 योग करने वाले और 16 ध्यान साधने वाले प्रतिभागियों की तुलना 15 ऐसे लोगों से की गई, जो दोनों में से कुछ भी नहीं करते थे। एक ’एमआरटी’ (मैग्नेटिक रेज़ोनैंस टोमोग्राफ़) की सहता से पहले उनकी दिमागी गतिविधियों को मापा गया और उसके बाद हर एक के मस्तिष्क के 116 क्षेत्रों के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान का विश्लेषण किया गया। विश्लेषण से पता चला कि जो लोग योग और ध्यान किया करते हैं, उनके मस्तिष्क में सूचनाओं का प्रवाह, ऐसा नहीं करने वालों की अपेक्षा, कहीं अधिक और कारगर ढंग से होता है। यह भी देखा गया कि योग-ध्यान करने वालों के मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाओं (न्यूरॉन) का संजाल क्षतिग्रस्त होने से अपना कहीं बेहतर ढंग से बचाव करता हैदृ यानी उनकी बुद्धि अधिक समय तक सक्षम बनी रहती है। दूसरे शब्दों में, योग और ध्यान बढ़ती हुई आयु के साथ बुद्धि और स्मरणशक्ति में आने वाली गिरावट से मस्तिष्क को लंबे समय तक बचाए रख सकते हैं। इसी तरह के एक दूसरे प्रयोग में प्रतिभागियों के एक ग्रुप से 20 मिनट तक योगाभ्यास कराया गया और दूसरे ग्रुप को 20 मिनट तक एक मेहनती खेल खेलना पड़ा। बाद में दोनों ग्रुपों को दिमागी परीक्षा ली गई। यह परीक्षा योगाभ्यासी ग्रुप ने, खिलाड़ी ग्रुप की अपेक्षा, कम समय और बेहतर ढंग से पास करली।
फ्री-रैडिकल्स को करे निष्क्रिय
हमारे स्वास्थ्य के लिए आजकल सबसे बड़ी चुनौती है कैंसर से बचे रहना। कैंसर के अनेक प्रकार हैं और अनेक कारक भी। एक ख़तरनाक कारक हैं हमारे शरीर के भीतर बनने वाले वे ’फ्री-रैडिकल’, जो सूर्य प्रकाश की पराबैंगनी (अल्ट्रावायोलेट) किरणों, प्रदूषित गैसों, पर्यावरण प्रदूषण और डॉक्टरी दवाओं के प्रभाव से बनते हैं। फ्री-रैडिकल ऑक्सीजन-धारी ऐसे अणुओं को कहते हैं, जिनकी रासायनिक संरचना में एक इलेक्ट्रॉन की कमी रह गई है। इस के कारण वे बेहद अस्थिर होते हैं। जिस इलेक्ट्रॉन की कमी होती है, उस की जगह भरने के लिए वे कहीं किसी दूसरे अणु से दृ उदाहरण के लिए किसी कोशिका की दीवार से, किसी प्रोटीन के अणु से या डीनए से कोई नया इलेक्ट्रॉन झपट लेने की भयंकर उतावली में रहते हैं। वैज्ञानिकों ने हिसाब लगाया है कि हमारे शरीर में जैसे ही कहीं कोई फ्री-रैडिकल अणु बनता है, वह एक सेकंड के 10 अरबवें हिस्से के बराबर समय में किसी दूसरे अणु पर डाका डालकर उसका एक इलेक्ट्रॉन छीन लेता है। अपना एक इलेक्ट्रॉन छिन जाने से अब यह दूसरा अणु फ्री-रैडिकल बन जाता है और किसी तीसरे अणु से उसका एक इलेक्ट्रॉन छीनता है। इस तरह शरीर में फ्री-रैडिकल बनने की एक अविराम श्रृखला शुरू हो सकती है। इन फ्री-रैडिकलों की सघनता बढ़ने से शरीर की बहुत-सी कोशिकाएं क्षतिग्रस्त होने और शारीरिक क्रियाएं बाधित होने लगती हैं। इससे कैंसर या मधुमेह जैसी कई बीमारियां हो सकती हैं। योग और ध्यान की एक बड़ी विशेषता यह भी है कि वे ऑक्सीजन-धारी फ्री-रैडिकलों को बांधने वाले ’एन्टी-ऑक्सिडंट’ का काम करते हैं। दूसरे शब्दों में, योग और ध्यान कैंसर और मधुमेह की रोकथाम करने और उनसे लड़ने में सहायक होते हैं। यूरोपीय देशों के विभिन्न अस्पतालों और विश्वविद्यालयों में इन दिनों मन और मस्तिष्क पर विशेषकर ध्यान साधना के प्रभावों के अध्ययनों की बाढ़-सी आई हुई है। डॉक्टर और मनोचिकित्सक हिंदू और बौद्ध ध्यान साधना विधियों को आधुनिक चिकित्सा पद्धति के साथ जोड़ने में व्यस्त हैं। अब तक के अनेक प्रयोग और अध्ययन इस बात की पुष्टि करते हैं कि ध्यान साधना से भय, क्रोध, चिंता, तनाव, अवसाद-विषाद या मूड ख़राब रहने जैसी शिकायतें न केवल घटती हैं, लंबे और नियमित अभ्यास द्वारा उनसे छुटकारा भी पाया जा सकता है। जर्मनी में गीसन विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिक उलरिश ओट योग-ध्यान की सहायता से मानसिक बीमारियों को दूर करने के एक नामी विशेषज्ञ हैं। अपनी बहुचर्चित पुस्तक ’संदेहियों के लिए योग’ में उन्होंने 50 ऐसे अभ्यासों का वर्णन किया है, जिनसे व्यावहारिक अनुभव प्राप्त कर कोई भी योग और ध्यान के प्रति अपना संदेह दूर कर सकता है। दूसरे शब्दों में, योगाभ्यास बिना, किसी दवा या गोली के, अपना उपचार स्वयं करने की शरीर की क्षमता को जागृत करता है। उल्लेखनीय है कि होम्योपैथी की दवाएं भी दृ जिनमें रासायनिक दृष्टि से शुद्ध पानी, अल्कोहल या दुग्ध-शर्करा के सिवाय कुछ नहीं होता दृ शरीर की स्वयं-उपचारक क्षमता को जागृत करने के ही सिद्धांत के अनुसार काम करती हैं।
योग-ध्यान कैंसर को भी करे कैंसल
कैंसर की रोकथाम या उपचार को लेकर योग-ध्यान की इस क्षमता पर ढेर सारे अध्ययन एवं परीक्षण हुए हैं और अब भी हो रहे हैं। उलरिश ओट का इस बारे में कहना है, ’’महिलाओं में स्तन कैंसर के बारे में बहुत सारे अध्ययन प्रकाशित हुए हैं। उनसे संकेत मिलता है कि योगाभ्यास इस प्रसंग में महिलाओं में एक नया आत्मविश्वास पैदा करनें में सहायक बन सकता है। योग और ध्यानसाधना से वे स्वयं को और अपने शरीर को स्वीकार करने की एक ऐसी सकारात्मक भावना अपने भीतर जगा सकती हैं, जो शारीरिक वेदना और मानसिक विषाद के आगे हार नहीं माने। इससे कैंसर जैसी भीमारी पर भी विजय पाई जा सकती है। वेदना और विषाद ही अंततः शारीरिक बीमारियों का रूप लेते है।’’ योग और ध्यान की इसी क्षमता के कारण आधुनिक एलोपैथिक चिकित्सा के बर्लिन के दो डॉक्टर एमोगन डालमान और मार्टिन ज़ोडर अपने दवाखाने में अब केवल योगाभ्यास के द्वारा ही रोगियों का उपचार करते हैं। ’’आधुनिक चिकित्सा पद्धति के हम डॉक्टरों को अब अपना विचार बदलना होगा’’, उनका कहना है, ’’क्योंकि आधुनिक चिकित्सा पद्धति केवल बीमारी को देखती है, बीमार व्यक्ति को नहीं।’’
बर्लिन के शारिते अस्पताल सहित कई जगहों पर देखा गया है कि साक्षीभाव जैसी ध्यानसाधना से मस्तिष्क की तंत्रिका-संरचनाओं और क्रियाओं में कुछ ऐसे अनुकूल परिवर्तन लाए जा सकते हैं, जो दवाओं से संभव नहीं हैं। लोग पहले की अपेक्षा बेहतर ढंग से एकाग्र होकर सोचविचार कर सकते हैं और नाकारात्मक विचारों को दूर भगा सकते हैं। ’न्यूक्लियर मैग्नेटिक रेज़ोनंस टोमोग्राफ़ी’ (एनएमआरटी) के द्वारा उनके मस्तिष्क में झांकने से पता चालता है कि दोनों कनपटियों के पीछे स्थित हिपोकैंपस में तंत्रिका कोशिकाओं, उनके शिखातंतुओं (डेंड्राइट्स), तंत्रिका कोशिकाओं और उनके शिखातंतुओं को जोड़ने वाले साइनैप्स इत्यादि को मिलाकर बने तथाकथित ग्रे-मैटर की मात्रा बढ़ जाती है। कुछ सीखने और याद रखने की दृष्टि से हिपोकैंपस बहुत महत्वपर्ू्ण है। वहां ग्रे-मैटर के बढ़ जाने का अर्थ है कि ध्यानसाधना से कुछ नई तंत्रिका कोशिकाएं भी बनती हैं और स्मरणशक्ति बढ़ती है।
निष्कर्ष
योग सिर्फ एक व्यायाम नहीं है, बल्कि यह एक जीवन शैली है। यह शरीर, मन और आत्मा को एकजुट करने और एक स्वस्थ और खुशहाल जीवन जीने में मदद करता है। नियमित योग अभ्यास निरोग रहने का एक शक्तिशाली तरीका है।
REFERENCES:
1. पतंजलि योग सूत्रः इसमें योग के आठ अंगों का विस्तृत वर्णन है जो निरोगी जीवन के लिए मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
2. हठयोग प्रदीपिकाः यह ग्रंथ शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए योग के प्रभाव को विस्तार से समझाता है।
3. गेराण्ड संहिताः इस ग्रंथ में योग के विभिन्न आसनों और उनके स्वास्थ्य लाभों का वर्णन मिलता है।
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Received on 08.09.2024 Modified on 21.09.2024 Accepted on 12.10.2024 © A&V Publication all right reserved Int. J. Ad. Social Sciences. 2024; 12(3):175-180. DOI: 10.52711/2454-2679.2024.00028 |